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नाम जपकी महिमा Nam jap chanting holy name

hanuman

राजस्थानमें हुवे ईश्वरप्राप्त संत स्वामी रामसुख दासजी महाराज इनकी पूरी आयु साधकों को मार्गदर्शन करने मे व्यतीत की। वह बहुतही सरल भाषा में गहरे विषयोंमे मार्गदर्शन करते थे। उनके प्रवचन सुनने के लिए हृषिकेश में तथा बीकानेर अथवा जहाँ जहाँ भी उनके प्रवचन होते थे तो लोगोंकी भीड़ उमड़ती थी। 

यहाँ ऐसे ही उनके प्रवाचनोंमे उन्होंने भगवन्नाम की महत्ता बताते हुवे साधकोंके शंकाओं का निरसन भी किया हुवा है। वह वाचकों के लिए प्रस्तुत है। 

आशा है परमात्म प्रेमी साधकों को यह उपयुक्त लगेगा। 

Nam jap chanting holy name

नाम-जपकी महिमा

 

 

नाम-जपमें भाव कम भी रहे तो भी नाम जपनेसे लाभ तो होगा ही, पर कब होगा- इसका पता नहीं। नाम-जपकी संख्या ज्यादा बढ़नेसे भी भाव बन जाता है, क्योंकि नाम-जप करनेवालेके भीतर सूक्ष्म भाव रहता ही है, वह भाव नामकी संख्या बढ़नेसे प्रकट हो जाता है।

नाम-जप कर्म नहीं है, बल्कि पूजा है; क्योंकि नाम-जप में जपकर्ता का लक्ष्य ईश्वर से सम्बन्ध होता है। जैसे कर्मों से कल्याण नहीं होता। कर्म अपना फल देते हैं और नष्ट हो जाते हैं, लेकिन कर्मों में निःस्वार्थता की प्रधानता होने के कारण वे कल्याणप्रदायक बन जाते हैं। इसी प्रकार, नाम-जप के साथ भगवान का मुख्य लक्ष्य, नाम-जप भगवान को प्राप्त करने का साधन बन जाता है। ईश्वर का मुख्य लक्ष्य होने से नाम प्रतीकात्मक हो जाता है, फिर उसमें क्रिया नहीं रहती। इसके अलावा नाम जपने वाले में भी वह प्रतीकात्मकता आ जाती है अर्थात् नाम जपने वाले का शरीर भी प्रतीकात्मक हो जाता है। उसके शरीर की जड़ता मिट जाती है। उदाहरण के लिए, तुकारामजी महाराज अपने शरीर के साथ वैकुण्ठ चले गये। मीराबाई का शरीर भगवान के विग्रह में समा गया।

कबीरजीका शरीर अदृश्य हो गया और उसके स्थानपर लोगोंको पुष्प मिले। चोखामेलाकी हड्डियोंसे ‘विठ्ठल’ नामकी ध्वनि सुनाई पड़ती थी।

प्रश्न – शास्त्रों, सन्तोंने भगवन्नामकी जो महिमा गायी है, वह कहाँतक सच्ची है ?

त्तर- शास्त्रों और सन्तोंने नामकी जो महिमा गायी है, वह पूरी सच्ची है।

इतना ही नहीं, आजतक जितनी नाम- महिमा गायी गयी है, उससे नाम-महिमा पूरी नहीं हुई है, प्रत्युत अभी बहुत नाम-महिमा बाकी है। कारण कि भगवान् अनन्त हैं; अतः उनके नामकी महिमा भी अनन्त है-

 ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ (मानस १ । १४० । ३) ।

 नामकी पूरी महिमा स्वयं भगवान् भी नहीं कह सकते – ‘रामु न सकहिं नाम गुन गाई’ (१।२६।४) ।

प्रश्न- नामकी जो महिमा गायी गयी है, वह नाम-जप करनेवाले व्यक्तियोंमें देखनेमें नहीं आती, इसमें क्या कारण है ?

उत्तर– नामके माहात्म्यको स्वीकार न करनेसे नामका तिरस्कार, अपमान होता है; अतः वह नाम उतना असर नहीं करता।

नामजपमें मन न लगानेसे, इष्टके ध्यानसहित नाम-जप न करनेसे, हृदयसे नामको महत्त्व न देनेसे, आदि-आदि दोषोंके कारण नामका माहात्म्य शीघ्र देखनेमें नहीं आता। हाँ किसी प्रकारसे नामजप मुखसे चलता रहे तो उससे भी लाभ होता ही है, पर इसमें समय लगता है। मन लगे चाहे न लगे, पर नाम-जप निरन्तर चलता रहे, कभी छूटे नहीं तो नाम-महाराजकी कृपासे सब काम हो जायगा अर्थात् मन लगने लग जायगा, नामपर श्रद्धा-विश्वास भी हो जायँगे, आदि-आदि ।

अगर भगवन्नाममें अनन्यभाव हो और नामजप निरन्तर चलता रहे तो उससे वास्तविक लाभ हो ही जाता है; क्योंकि भगवान्‌का नाम सांसारिक नामोंकी तरह नहीं है। भगवान् चिन्मय हैं; अतः उनका नाम भी चिन्मय (चेतन) है। राजस्थानमें बुधारामजी नामक एक सन्त हुए हैं। वे जब नाम-जपमें लगे, तब उनको नाम-जपके बिना थोड़ा भी समय खाली जाना सुहाता नहीं था। जब भोजन तैयार हो जाता, तब माँ उनको भोजनके लिये बुलाती और वे भोजन करके पुनः नाम-जपमें लग जाते। एक दिन उन्होंने माँसे कहा कि

“माँ ! रोटी खानेमें बहुत समय लगता है; अतः केवल दलिया बनाकर थालीमें परोस दिया कर और जब वह थोड़ा ठण्डा हो जाया करे, तब मेरेको बुलाया कर।“

 माँने वैसा ही किया। एक दिन फिर उन्होंने कहा कि “माँ ! दलिया खानेमें भी समय लगता है; अतः केवल राबड़ी बना दिया कर और जब वह ठण्डी हो जाया करे, तब बुलाया कर।“

 इस तरह लगनसे नाम-जप किया जाय तो उससे वास्तविक लाभ होता ही है।

शङ्का – अगर श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये हुए नाम-जपसे ही लाभ होता है, तो फिर नामकी महिमा क्या हुई ? महिमा तो श्रद्धा-विश्वासकी ही हुई ?

समाधान – जैसे, राजाको राजा न माननेसे राजासे होनेवाला लाभ नहीं होता;

पण्डितको पण्डित न माननेसे पण्डितसे होनेवाला लाभ नहीं होता; सन्त-महात्माओंको सन्त-महात्मा न माननेसे उनसे होनेवाला लाभ नहीं होता; भगवान् अवतार लेते हैं तो उनको भगवान् न माननेसे उनसे होनेवाला लाभ नहीं होता, परंतु राजा आदिसे लाभ न होनेसे राजा आदिमें कमी थोड़े ही आ गयी ? कमी तो न माननेवालीकी ही हुई। ऐसे ही जो नाममें श्रद्धा-विश्वास नहीं करता, उसको नामसे होनेवाला लाभ नहीं होता, पर इससे नामकी महिमामें कोई कमी नहीं आती। कमी तो नाममें श्रद्धा-विश्वास न करनेवालेकी ही है।

नाममें अनन्त शक्ति है। वह शक्ति नाममें श्रद्धा-विश्वास करनेसे तो बढ़ेगी और श्रद्धा-विश्वास न करनेसे घटेगी – यह बात है ही नहीं। हाँ, जो नाममें श्रद्धा-विश्वास करेगा, वह तो नामसे लाभ ले लेगा, पर जो श्रद्धा-विश्वास नहीं करेगा, वह नामसे लाभ नहीं ले सकेगा। दूसरी बात, जो नाममें श्रद्धा- विश्वास नहीं करता, उसके द्वारा नामका अपराध होता है। उस अपराधके कारण वह नामसे होनेवाले लाभको नहीं ले सकता।

प्रश्न – श्रद्धा-विश्वासके बिना भी अग्निको छूनेसे हाथ जल जाता है, फिर श्रद्धा-विश्वासके बिना नाम लेनेसे उसकी महिमा तत्काल प्रकट क्यों नहीं होती ?

उत्तर- अग्नि भौतिक वस्तु है और वह भौतिक वस्तुओंको ही जलाती है; परन्तु भगवान्‌का नाम अलौकिक, दिव्य है। नाम-जप करनेवालेका नाममें ज्यों-ज्यों भाव बढ़ता है, त्यों-त्यों उसके सामने नामकी महिमा प्रकट होने लगती है, उसको नाम-महिमाकी अनुभूति होने लगती है, नाममेंनाम-जपकी महिमा विचित्रता, अलौकिकता दीखने लगती है। नाममें एक विचित्रता है कि मनुष्य बिना भाव, श्रद्धाके भी हरदम नाम लेता रहे तो उसके सामने नामकी शक्ति प्रकट हो जायगी, पर उसमें समय लग सकता है।

प्रश्न- क्या एक बार नाम लेनेसे ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं ?

उत्तर- हाँ, आर्तभावसे लिये हुए एक नामसे ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

मनुष्यको अन्तसमयमें मृत्युसे छुड़ानेवाला कोई भी नहीं दीखता, वह सब तरफसे निराश हो जाता है, उस समय आर्तभावसे उसके मुखसे एक नाम भी निकलता है तो वह एक ही नाम उसके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है। जैसे गजेन्द्रको ग्राह खींचकर जलमें ले जा रहा था। गजेन्द्रने देखा कि अब मुझे कोई छुड़ानेवाला नहीं है, अब तो मौत आ गयी है, तो उसने आर्तभावसे एक ही बार नाम लिया। नाम लेते ही भगवान् आ गये और उन्होंने ग्राहको मारकर गजेन्द्रको छुड़ा लिया।जिसका भगवान्‌के नाममें अटूट श्रद्धा-विश्वास है, अनन्यभाव है, उसका एक ही नामसे कल्याण हो जाता है।

प्रश्न- जब एक ही नामसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं, तो फिर बार-बार नाम लेनेकी क्या आवश्यकता है ?

उत्तर-बार-बार नाम लेनेसे ही वह एक आर्तभाव- वाला नाम निकलता है। जैसे मोटरके इंजनको चालू करनेके लिये बार-बार हैण्डल घुमाते हैं तो हैण्डलको पहली बार घुमानेसे इंजन चालू होगा या पाँचवीं, दसवीं अथवा पंद्रहवीं बार घुमानेसे इंजन चालू होगा- इसका कोई पता नहीं रहता। परन्तु हैण्डलको बार-बार घुमाते रहनेसे किसी-न-किसी घुमावमें इंजन चालू हो जाता है। ऐसे ही बार-बार भगवन्नाम लेते रहनेसे कभी-न-कभी वह आर्तभाव- वाला एक नाम आ ही जाता है। अतः बार-बार नाम लेना बहुत जरूरी है।

प्रश्न – जो मनुष्य नाम-जप तो करता है, पर उसके द्वारा निषिद्ध कर्म भी होते हैं, उसका उद्धार होगा या नहीं ?

उत्तर- समय पाकर उसका उद्धार तो होगा ही; क्योंकि किसी भी तरहसे लिया हुआ भगवन्नाम निष्फल नहीं जाता। परन्तु नामजपका जो प्रत्यक्ष प्रभाव है, वह उसके देखनेमें नहीं आयेगा। वास्तवमें देखा जाय तो जिसका एक परमात्माको ही प्राप्त करनेका ध्येय नहीं है, उसीके द्वारा निषिद्ध कर्म होते हैं।

जिसका ध्येय एक परमात्मप्राप्तिका ही है, उसके द्वारा निषिद्ध कर्म हो ही नहीं सकते। जैसे, जिसका ध्येय पैसोंका हो जाता है, वह फिर ऐसा कोई काम नहीं करता, जिससे पैसे नष्ट होते हों। वह पैसोंका नुकसान नहीं सह सकता; और कभी किसी कारणवश पैसे नष्ट हो जायँ तो वह बेचैन हो जाता है। ऐसे ही जिसका ध्येय परमात्मप्राप्तिका बन जाता है, वह फिर साधनसे विपरीत काम नहीं कर सकता। अगर उसके द्वारा साधनसे विपरीत कर्म होते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि अभी उसका ध्येय परमात्मप्राप्ति नहीं बना है।

साधकको चाहिये कि वह परमात्मप्राप्तिका ध्येय दृढ़ बनाये और नाम-जप करता रहे तो फिर उससे निषिद्ध क्रिया नहीं होगी। कभी निषिद्ध क्रिया हो भी जायगी तो उसका बहुत पश्चात्ताप होगा, जिससे वह फिर आगे कभी नहीं होगी ।

प्रश्न- जिसके पाप बहुत हैं, वह भगवान्‌का नाम नहीं ले सकता; अतः वह क्या करे ?

उत्तर- बात सच्ची है। जिसके अधिक पाप होते हैं, वह भगवान्‌का नाम नहीं ले सकता।

वैष्णवे भगवद्भक्तौ प्रसादे हरिनाम्न्नि च । अल्पपुण्यवतां श्रद्धा यथावन्नैव जायते ।।

अर्थात् जिसका पुण्य थोड़ा होता है, उसकी भक्तोंमें, भक्तिमें, भगवत्प्रसादमें और भगवन्नाममें श्रद्धा नहीं होती।

जैसे पित्तका जोर होनेपर रोगीको मिश्री भी कड़वी लगती है। परन्तु यदि वह मिश्रीका सेवन करता रहे तो पित्त शान्त हो जाता है और मिश्री मीठी लगने लग जाती है। ऐसे ही पाप अधिक होनेसे नाम अच्छा नहीं लगता; परन्तु नाम-जप करना शुरू कर दे तो पाप नष्ट हो जायँगे और नाम अच्छा, मीठा लगने लग जायगा तथा नाम-जपका प्रत्यक्ष लाभ भी दीखने लग जायगा।

प्रश्न – जिसके भाग्यमें नाम लेना लिखा है, वह तो नाम ले सकता है, उसके मुखसे नाम निकल सकता है; परंतु जिसके भाग्यमें नाम लेना लिखा ही नहीं, वह कैसे नाम ले सकता है ?

उत्तर-एक ‘होना’ होता है और एक ‘करना’ होता है। भाग्य अर्थात् पुराने कर्मोंका फल होता है और नये कर्म किये जाते हैं, होते नहीं। जैसे व्यापार करते हैं और नफा-नुकसान होता है; खेती करते हैं और लाभ-हानि होती है; मन्त्रका सकामभावसे जप (अनुष्ठान) करते हैं और उसका नीरोगता आदि फल होता है।

बद्रीनारायण जाते हैं- यह ‘करना’ हुआ और चलते-चलते बद्रीनारायण पहुँच जाते हैं- यह ‘होना’ हुआ। दवा लेते हैं – यह ‘करना’ हुआ और शरीर स्वस्थ या अस्वस्थ होता है – यह ‘होना’ हुआ। हानि-लाभ, जीना-मरना, यश-अपयश- ये सब होनेवाले हैं; क्योंकि ये पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके फल हैं  (सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ)

 परन्तु नाम-जप करना नया काम है। यह करनेका है, होनेका नहीं। इसको करनेमें सब स्वतन्त्र हैं। हाँ, इसमें इतनी बात होती है कि अगर किसीने पहले नाम-जप किया हुआ है तो नाम-जपकी महिमा सुनते ही उसकी नाम-जपमें रुचि हो जायगी और वह सुगमतासे होने लग जायगा । परन्तु पहले जिसका नाम जप किया हुआ नहीं है, वह अगर नामकी महिमा सुने तो उसकी नाम-जपमें जल्दी रुचि नहीं होगी। अगर नाम-जपकी महिमा कहनेवाला अनुभवी हो तो सुननेवालेकी भी नाममें रुचि हो जायगी और उस अनुभवीके सङ्गमें रहनेसे उसके लिये नाम-जप करना भी सुगम हो जायगा।

जो भाग्यमें लिखा है, वह फल होता है, नया कर्म नहीं। नाम-जप करना शुरू कर दें तो वह होने लग जायगा; क्योंकि नाम-जप करना नया कर्म, नयी उपासना है। अतः ‘हमारे भाग्यमें नाम जप करना, सत्सङ्ग करना, शुभ कर्म करना लिखा हुआ नहीं है’ – ऐसा कहना बिलकुल बहानेबाजी है। ‘नाम-जप, सत्सङ्ग आदि हमारे भाग्यमें नहीं हैं’- ऐसा भाव रखना कुसङ्ग है, जो नाम-जप आदि करनेके भावका नाश करनेवाला है।

प्रश्न – नाम-जपसे भाग्य (प्रारब्ध) पलट सकता है ?

उत्तर- हाँ, भगवन्नामके जपसे, कीर्तनसे प्रारब्ध बदल जाता है, नया प्रारब्ध बन जाता है; जो वस्तु न मिलनेवाली हो वह मिल जाती है; जो असम्भव है, वह सम्भव हो जाता है-ऐसा सन्तोंका, महापुरुषोंका अनुभव है।

जिसने कर्मोंक फलका विधान किया है, उसको कोई पुकारे, उसका नाम ले तो नाम लेनेवालेका प्रारब्ध बदलनेमें आश्चर्य ही क्या है ? ये जो लोग भीख माँगते फिरते हैं, जिनको पेटभर खानेको भी नहीं मिलता, वे अगर सच्चे हृदयसे नामजपमें लग जायँ तो उनके पास रोटियोंका, कपड़ोंका ढेर लग जायगा; उनको किसी चीजकी कमी नहीं रहेगी। परन्तु नाम-जपको प्रारब्ध बदलनेमें, पापोंको काटनेमें नहीं लगाना चाहिये। जैसे अमूल्य रत्नके बदलेमें कोयला खरीदना बुद्धिमानी नहीं है, ऐसे ही अमूल्य भगवन्नामको तुच्छ कामोंमें लगाना बुद्धिमानी नहीं है।

प्रश्न- जब केवल नाम जपसे ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं, तो फिर शास्त्रोंमें पापोंको दूर करनेके लिये तरह-तरहके प्रायश्चित्त क्यों बताये गये हैं ?

उत्तर- नाम-जपसे ज्ञात, अज्ञात आदि सभी पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है, सभी पाप नष्ट हो जाते हैं; परन्तु नामपर श्रद्धा-विश्वास न होनेसे शास्त्रोंमें तरह-तरहके प्रायश्चित्त बताये गये हैं।

अगर नामपर श्रद्धा-विश्वास हो जाय तो दूसरे प्रायश्चित्त करनेकी जरूरत नहीं है। नाम-जप करनेवाले भक्तसे अगर कोई पाप भी हो जाय, कोई गलती हो जाय तो उसको दूर करनेके लिये दूसरा प्रायश्चित्त करनेकी जरूरत नहीं है। वह नाम-जपको ही तत्परतासे करता रहे तो सब ठीक हो जायगा।

प्रश्न- अगर कोई सकामभावसे नाम-जप करे तो क्या वह नाम-जप फल देकर नष्ट हो जायगा ?

उत्तर- यद्यपि सांसारिक तुच्छ कामनाओंकी पूर्तिके लिये नामको खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है, तथापि अगर सकामभावसे भी नाम-जप किया जाय तो भी नामका माहात्म्य नष्ट नहीं होता। नाम-जप करनेवालेको पारमार्थिक लाभ होगा ही; क्योंकि नामका भगवान्‌के साथ साक्षात् सम्बन्ध है। हाँ, नामको सांसारिक कामनापूर्तिमें लगाकर उसने नामका जो तिरस्कार किया है, उससे उसको पारमार्थिक लाभ कम होगा। अगर वह तत्परतासे नाममें लगा रहेगा, नामके परायण रहेगा तो नामकी कृपासे उसका सकामभाव मिट जायगा। जैसे, ध्रुवजीने सकामभावसे, राज्यकी इच्छासे ही नाम-जप किया था। परन्तु जब उनको भगवान्‌के दर्शन हुए तब राज्य एवं पद मिलनेपर भी वे प्रसन्न नहीं हुए, प्रत्युत उनको अपने सकामभावका दुःख हुआ अर्थात् उनका सकामभाव मिट गया। जो सकामभावसे नाम-जप किया करते हैं, उनको भी नाम-महाराजकी कृपासे अन्तसमयमें नाम याद आ सकता है और उनका कल्याण हो सकता है !

प्रश्न – शास्त्रोंमें तथा सन्तोंने कहा है कि अमुक संख्यामें नाम-जप करनेसे भगवान्के दर्शन हो जाते हैं, क्या ऐसा होता है ?

उत्तर- हाँ, ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।’

– मन्त्रका साढ़े तीन करोड़ जप करनेसे भगवान्‌के दर्शन हो जाते हैं- ऐसा ‘कलिसंतरणोपनिषद्’ में आया है। ‘राम’ नामका तेरह करोड़ जप करनेसे भगवान्‌के दर्शन हो जाते हैं- ऐसा समर्थ रामदास बाबाने ‘दासबोध’ में लिखा है। परन्तु नाममें, भगवान्में श्रद्धा-विश्वास और प्रेम अधिक हो तो उपर्युक्त संख्यासे पहले भी भगवान्‌के दर्शन हो सकते हैं।

नाम-जपकी महिमा

प्रश्न – ‘नहि कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥’ (मानस १।२७।४) – ऐसा कहनेका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-कलियुगमें यज्ञादि शुभ-कर्मोंका साङ्गोपाङ्ग होना बहुत कठिन है और उनके विधि-विधानको ठीक तरहसे जाननेवाले पुरुष भी बहुत कम रह गये हैं तथा शुद्ध गोघृत आदि सामग्री मिलनी भी कठिन हो रही है। अतः कलियुगमें शुभ-कर्मोंका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग न होनेसे, उसमें विधि-विधानकी कमी रहनेसे कर्ताको दोष लगता है।

वैधीभक्ति विधि-विधानसे की जाती है। उसमें किस इष्टदेवका किस विधिसे पूजा-पाठ होना चाहिये- इसको जाननेवाले बहुत कम हैं। अतः वह भक्ति करना भी इस कलियुगमें कठिन है।

ज्ञानमार्ग कठिन है और ज्ञानमार्गकी साधना बतानेवाले अनुभवी पुरुषोंका मिलना भी बहुत कठिन है। अतः विवेकमार्गमें चलना कलियुगमें बहुत कठिन है। तात्पर्य है कि इस कलियुगमें कर्म, भक्ति और ज्ञान – इन तीनोंका होना बहुत कठिन है, पर भगवान्‌का नाम लेना कठिन नहीं है। भगवान्‌का नाम सभी ले सकते हैं; क्योंकि उसमें कोई विधि-विधान नहीं है। उसको बालक, स्त्री, पुरुष, वृद्ध, रोगी आदि सभी ले सकते हैं और हर समय, हर परिस्थितिमें, हर अवस्थामें ले सकते हैं।

नाम एक सम्बोधन है, पुकार है। उसमें आर्तभावकी ही मुख्यता है, विधिकी मुख्यता नहीं। अतः भगवान्‌का नाम लेकर हरेक मनुष्य आर्तभावसे भगवान्‌को पुकार सकता है।

शङ्का-नाम-जपमें मन नहीं लगता और मन लगे बिना नाम-जप करनेमें कुछ फायदा नहीं ! कहा भी है-

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरै मुख माहि । मनुवाँ तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं ॥

समाधान – मन नहीं लगेगा तो ‘सुमिरन’ (स्मरण) नहीं होगा – यह बात सच्ची है, पर नाम-जप नहीं होगा – यह बात दोहेमें नहीं कही गयी है। मन नहीं लगनेसे सुमिरन नहीं होगा तो नहीं सही, पर नाम जप तो हो ही जायगा ! नाम-जप कभी व्यर्थ हो ही नहीं सकता; अतः मन लगे चाहे न लगे, नाम-जप करते रहना चाहिये।

जब मन लगेगा, तब नाम जप करेंगे- ऐसा होना सम्भव नहीं है। हाँ, अगर हम नाम जप करने लग जायें तो मन भी लगने लग जायगा; क्योंकि मनका लगना नाम-जपका परिणाम है।

प्रश्न- शास्त्रमें आता है कि जो नाम नहीं लेना चाहता, जिसकी नामपर श्रद्धा नहीं है, उसको नाम नहीं सुनाना चाहिये; क्योंकि यह नामापराध है; फिर भी गौराङ्ग महाप्रभु आदिने नामपर श्रद्धा न रखनेवालोंको भी नाम क्यों सुनाया ?

उत्तर- जो नाम नहीं सुनना चाहता, मुखसे भी नहीं लेना चाहता, नामका तिरस्कार करता है, उसको नाम नहीं सुनाना चाहिये – यह विधि है, शास्त्रकी आज्ञा है; फिर भी सन्त-महापुरुष दया करके उसको नाम सुना देते हैं। उनकी दयामें विधि-निषेध लागू नहीं होता। विधि-निषेध, ‘कर्म’ में लागू होता है और ‘दया’ कर्मसे अतीत है।

दया अहैतुकी होती है, हेतुके बिना की जाती है। जैसे, कोई भगवत्प्राप्त सन्त-महापुरुष अपनी सामर्थ्यसे दूसरेको कोई चीज देता है तो यह चीज लेनेवालेके पूर्वकर्मका फल नहीं है यह तो उस सन्त-महापुरुषकी दया है। ऐसे ही गौराङ्ग महाप्रभु आदि सन्तोंने दया परवश होकर दुष्ट, पापी व्यक्तियोंको भी भगवन्नाम सुनाया।

प्रश्न – अगर मरणासन्न पशु, पक्षी आदिको भगवत्राम सुनाया जाय तो क्या उनका उद्धार हो सकता है ?

उत्तर-पशु, पक्षी आदि भगवन्नामके प्रभावको नहीं समझते और अपने-आप प्रभाव आ जाय तो वे उसका विरोध भी नहीं करते। वे नामकी निन्दा, तिरस्कार नहीं करते, नामसे घृणा नहीं करते। अतः उनको मरणासन्न अवस्थामें नाम सुनाया जाय तो उनपर नामका प्रभाव काम करता है अर्थात् नामके प्रभावसे उनका उद्धार हो जाता है।

प्रश्न- अन्तसमयमें कोई अपने पुत्र आदिके रूपमें भी ‘नारायण’, ‘वासुदेव’ आदि नाम लेता है तो उसको भगवान् अपना ही नाम मान लेते हैं; ऐसा क्यों ?

उत्तर- भगवान् बहुत दयालु हैं। उन्होंने यह विशेष छूट दी है कि अगर मनुष्य अन्तसमयमें किसी भी बहाने भगवान्‌का नाम ले ले, उनको याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा। कारण कि भगवान्ने जीवका कल्याण करनेके लिये ही उसको मनुष्य-शरीर दिया है और जीवने उस२६

मनुष्य-शरीरको स्वीकार किया है। अतः जीवका कल्याण हो जाय, तभी भगवान्‌का इस जीवको मनुष्य-शरीर देना और जीवका मनुष्य-शरीर लेना सार्थक होगा। परन्तु वह अपना कल्याण किये बिना ही मनुष्य-शरीरको छोड़कर जा रहा है, इसलिये भगवान् उसको मौका देते हैं कि अब जाते-जाते तू किसी भी बहाने मेरा नाम ले ले, मेरेको याद कर ले तो तेरा कल्याण हो जायगा ! जैसे अन्तसमयमें भयानक यमदूत दीखनेपर अजामिलने अपने पुत्र नारायणको पुकारा तो भगवान्ने उसको अपना ही नाम मान लिया और अपने चार पार्षदोंको अजामिलके पास भेज दिया।

तात्पर्य है कि मनुष्यको रात-दिन, खाते-पीते, सोते-जागते, चलते-फिरते, सब समय भगवान्‌का नाम लेते ही रहना चाहिये।

मनको बार-बार ध्येयमें लगानेका नाम ‘अभ्यास’ है। इस अभ्यासकी सिद्धि समय लगानेसे होती है। समय भी निरन्तर लगाया जाय, रोजाना लगाया जाय। कभी अभ्यास किया, कभी नहीं किया- ऐसा नहीं हो। तात्पर्य है कि अभ्यास निरन्तर होना चाहिये और अपने ध्येयमें महत्त्व तथा आदर-बुद्धि होनी चाहिये। इस तरह अभ्यास करनेसे अभ्यास दृढ़ हो जाता है।

अभ्यासके दो भेद होते हैं- (१) अपना जो लक्ष्य, ध्येय है, उसमें मनोवृत्तिको लगाये और दूसरी वृत्ति आ जाय अर्थात् दूसरा कुछ भी चिन्तन आ जाय, उसकी उपेक्षा कर दे, उससे उदासीन हो जाय।

(२) जहाँ-तहाँ मन चला जाय, वहाँ-वहाँ ही अपने लक्ष्यको, इष्टको देखे ।

उपर्युक्त दो साधनोंके सिवाय मन लगानेके कई उपाय हैं, जैसे-

(१) जब साधक ध्यान करनेके लिये बैठे, तब सबसे पहले दो-चार श्वास बाहर फेंककर ऐसी भावना करे कि मैंने मनसे संसारको सर्वथा निकाल दिया, अब मेरा मन संसारका चिन्तन नहीं करेगा, भगवान्‌का ही चिन्तन करेगा और चिन्तनमें जो कुछ भी आयेगा, वह भगवान्‌का ही स्वरूप होगा। भगवान्‌के सिवाय मेरे मनमें दूसरी बात आ ही नहीं सकती । अतः भगवान्‌का स्वरूप वही है, जो मनमें आ जाय और मनमें जो आ जाय, वही भगवान्‌का स्वरूप है – यह

‘वासुदेवः सर्वम्’ का ‘सिद्धान्त है। ऐसा होनेपर मन भगवान्‌में ही लगेगा; और लगेगा ही कहाँ ?

(२) भगवान्के नामका जप करे, पर जपमें दो बातोंका ख्याल रखे-एक तो नामके उच्चारणमें समय खाली न जाने दे अर्थात् ‘रामराम’ इस तरह नामका भले ही धीरे-धीरे उच्चारण करे, पर बीचमें समय खाली न जाने दे और दूसरे नामको सुने बिना न जाने दे अर्थात् जपके साथ-साथ उसको सुने भी ।

(३) जिस नामका उच्चारण किया जाय, मनसे उस नामका निगरानी रखे अर्थात् उस नामको अंगुली अथवा मालासे न गिनकर मनसे ही नामका उच्चारण करे और मनसे ही नामकी गिनती करे।

(४) एक नामका तो वाणीसे उच्चारण करे और दूसरे नामका मनसे जप करे; जैसे- वाणीसे तो ‘राम-राम-राम’ का उच्चारण करे और मनसे ‘कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण’ का जप करे।

(५) जैसे राग-रागिनीके साथ बोलकर नामका कीर्तन करते हैं, ऐसी ही राग-रागिनीके साथ मनसे नामका कीर्तन करे ।

राम.. राम.. राम….

तेजस्वी बुद्धी Divine Wisdom

gayatri mantra-1

 Divine Wisdom

ईश्वर शरण बुद्धि

चरकसंहिता हा आयुर्वेदाचा संस्कृत भाषेतील एक प्रसिद्ध ग्रन्थ आहे. याचे उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश आणि प्रतिसंस्कारक महर्षि चरक आहेत. एकदा महर्षि पुनर्वसु आपला हा अद्वितीय ग्रंथ निर्माण केल्यानंतर एका जंगलातून चालले होते. घनदाट जंगलातील पायवाटेवर, ते चालले होते आणि त्यांच्या मागे त्यांचा शिष्य अग्निवेश. चालता चालता एकदम पुनर्वसु थांबले. त्यांनी आकाशाकडे पाहिले, चारी दिशांना पाहिले, आणि एक सुस्कारा सोडून म्हणाले, “ महानाश होणार आहे.”

अग्निवेशांनी विचारले, “कसा महानाश, गुरुवर्य?”

पुनर्वसु म्हणाले, “ पृथ्वी दूषित होत आहे, पाणी दूषित होत आहे, वायु, तारे, आकाश, सूर्य, चंद्र, सगळे बिघडत आहेत. येणाऱ्या काळात, अन्नधान्य आपले गुण सोडून देईल, औषधी वनस्पति आपला प्रभाव सोडून देतील, पृथ्वीवर तुटणारे तारे येऊन आदळतील, विनाशकारी तूफान आणि भूकंप येईल, महानाशाचे तांडव होईल! मनुष्य वाचणार नाही!”

ही कथा चरक ‘विमान’ स्थानाच्या तिसऱ्या अध्यायात येते. त्यात पुढे असे सांगितले आहे, की अग्निवेशांनी जेंव्हा ही भयानक भविष्यवाणी ऐकली, तेंव्हा हात जोडून त्यांनी विचारले, “ गुरुदेव!, तुम्ही  अशी भयभीत करणारी भविष्यवाणी का बरें करीत आहात? सगळ्या रोगांचे उपाय सांगणारा असा ग्रंथ आपण लिहिलात. तरी हा असा विनाश येईल असे आपण का म्हणतात?”

महर्षि पुनर्वसु म्हणाले, “ ते मी यामुळे म्हणतो कारण की येणाऱ्या काळात लोक धर्म सोडून अधर्माच्या रस्त्याला लागतील, सत्य सोडून असत्याच्या मार्गाला लागतील. सत्य आणि धर्म यांमध्ये त्यांची रुचि राहणार नाही.”

अग्निवेशांनी विचारले, “ सत्य आणि धर्म यांमध्ये लोकांची रुचि न राहण्यामागे काय कारण असेल गुरुदेव?”

गुरुदेव म्हणाले, “ बुद्धिचे बिघडणे हेच या महानाशाचे कारण असेल. जेंव्हा बुद्धि बिघडते, तेंव्हा ती सत्याचा मार्ग सोडून असत्याच्या मार्गावर चालते, आणि तिची धर्मामध्ये रुचि राहत नाही.”

प्रज्ञापराधो मूलं सर्व रोगाणाम्|

बुद्धीच्या बिघडण्याने सर्व रोग होतात. पण बुद्धीच्या बिघडण्याने केवळ शारीरिक रोग निर्माण होत नाहीत, तर सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, आत्मिक रोगही निर्माण होतात. म्हणून असे म्हणतात की जेंव्हा विनाशाचा काळ जवळ येतो, तेंव्हा बुद्धि विपरीत होते, “विनाशकाले विपरीत बुद्धि”. देवता जेंव्हा कोणाचा नाश करायचा असतो, तेंव्हा दुसरे तिसरे काही करीत नाहीत, केवळ त्या माणसाची बुद्धि भ्रष्ट करतात. तसेच जेंव्हा कुणाचे रक्षण करायचे असते, तेंव्हा त्यांच्या बुद्धीत अशी प्रेरणा करतात की तो मनुष्य स्वतःच योग्य मार्गावर चालतो.

चाणक्याने म्हटले आहे, की “हे भगवान! जर माझ्या वाईट कर्मांमुळे माझे सर्व काही हरण होणार असेल, तर होऊ दे, पण केवळ माझी बुद्धि शाबूत माझ्याजवळ राहू दे.”

सामवेदात असेच वर्णन केले आहे. सामवेदाच्या 101 व्या  मंत्रात भक्तीचे वर्णन केले आहे, आणि म्हटले आहे, की भक्ति सफल होईल, तेंव्हा भगवंतांकडे काय मागायचे? तर ‘मेधा’ मागा. मेधा म्हणजे अशी बुद्धि जी मर्यादेत राहायला शिकविते, स्थिर राहते,  विसरत नाही.

जगप्रसिद्ध गायत्री मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेदाच्या तिसऱ्या मंडलाच्या 7 व्या सूक्ताचा 10 वा मंत्र म्हणून आला आहे.(इतर वेदांतही तो आला आहे.)त्यात कुठलीही धन संपत्ति मागितली नाही, तर सविता देवतेला आवाहन केले आहे, प्रार्थना केली आहे , की माझ्या बुद्धीला तुझ्याकडे घेऊन चल.

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒

भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

बादशहा अकबराची गोष्ट

अकबर बिरबलाच्या गोष्टी सर्वांनी ऐकल्या आहेत. बिरबल हा विद्वान ब्राह्मण होता. तो नेहमी ईश्वराचे स्मरण करीत असे. बादशहालाही सांगत असे- ईश्वराचे स्मरण करा. एके दिवशी बादशहा म्हणाला, “बिरबल, तू जो ईश्वर म्हणतोस तो कुठे राहतो? काय करतो? त्याचे दर्शन कसे होऊ शकते?”

बिरबल विचारात गढला. आता या बादशहाला समजेल आणि पटेल अशा भाषेत कसे सांगायचे?  बिरबलाने बादशहाकडून 7 दिवसांचा वेळ मागून घेतला. म्हणाला, सातव्या दिवशी तुमच्या प्रश्नांचे उत्तर देईन. सहा दिवस झाले, बिरबलाला काही उत्तर सुचले नाही. सातव्या दिवशी तो चिंतातुर बसला होता. बिरबलाचा ८ वर्षाचा मुलगा होता. तो बिरबलासारखाच चतुर तर होताच, पण इतक्या लहान वयातही अध्यात्माची त्याला खूप जाण होती, आणि आपले म्हणणे समोरच्याला पटवून देण्याची विलक्षण हातोटी त्याच्यात जन्मजात होती..  त्या त्याच्या मुलाने येऊन विचारले, “ पिताजी, का एवढे चिंतेत बसला आहात?”

बिरबल म्हणाला, “बादशहाने तीन प्रश्न विचारले आहेत. त्यांचे उत्तर काही अजून सापडत नाही.” असे म्हणून बिरबलाने मुलाला ते तीन प्रश्न कोणते तेही सांगितले.

तो छोटासा मुलगा म्हणाला, “इतक्याशा गोष्टीची चिंता करताय? याचे उत्तर तर मी सांगू शकतो”

बिरबल म्हणाला, “सांग बरे?”

मुलगा म्हणाला, “तुम्हाला नाही, बादशहाला सांगेल.”

शेवटी बिरबल मुलाला घेऊन बादशहाकडे गेला आणि म्हणाला, “महाराज, तुमच्या प्रश्नांची उत्तरें हा माझा मुलगा देईल.”

बादशहाने आश्चर्याने त्या मुलाकडे पाहिले आणि म्हणाला, “काय? हा तुझा छोटासा मुलगा माझ्या प्रश्नांचे उत्तर देईल?”

मग बादशहा त्या मुलाला म्हणाला, “सांग बरें, आमच्या प्रश्नांचे काय उत्तर आहे?”

मुलगा म्हणाला, “बादशहा, तुम्ही भारतात नवीन आले आहात. तुम्हाला भारताची संस्कृति अजून माहिती नाही. भारताची संस्कृति ही आहे की आपल्याकडे कोणी अतिथि आला, तर आधी त्याला खाऊपिऊ घाला, त्याचा सत्कार करा, मग त्याच्याशी बोला.”

बादशहा कौतुकाने म्हणाला, “बरे,  अतिथि महाराज, तुम्ही काय घेणार?”

मुलगा म्हणाला, “महाराज, मी छोटा आहे, त्यामुळे मला दूध आवडते.”

बादशहाने एका चांदीच्या पात्रात दूध मागवले, आणि मुलाला म्हणाला, “घ्यावे महाराज!”

मुलाने ते चांदीचे पात्र हातात घेतले, त्यातील दुधाचे निरीक्षण केले, त्यात आपले बोट बुडवून इकडे तिकडे फिरविले.

बादशहा म्हणाला, “काय करतो आहेस बाळा? दूध पीत का नाहीस?”

बालक म्हणाला, “बादशहा मी ऐकले आहे की दुधात मक्खन (लोणी) असते, पण या दुधात तर लोणी दिसत नाहीये.”

बादशहा हंसून म्हणाला, “ तू अजून बालक  आहेस, बाळा! अरे, या दुधात लोणी आहे. पण ते लोणी जर बघायचे असेल तर त्या दुधात दही  घालून त्याला विरजण लावावे लागते, त्याचे दही झाल्यावर त्याला घुसळावे लागते, खूप जोर लावावा लागतो. तेंव्हा कुठे लोणी वर येते.”

मुलगा म्हणाला, “बादशहा! तुमच्या पहिल्या दोन प्रश्नांचे हेच उत्तर आहे. ईश्वर सगळीकडे आहे. या जगाच्या कणाकणात आहे. पण त्याचे दर्शन तेंव्हा होते, जेंव्हा मनाला “ॐ” रूपी दही घालून विरजण लावले जाते, मग धारणा, ध्यान आणि समाधी यांच्या रवीने घुसळले जाते, तेंव्हा भक्त आपल्या हृदयात ईश्वराला प्रत्यक्ष, स्पष्टपणे पाहू शकतो.”

बादशहा म्हणाला, “अरे वा! तू माझ्या पहिल्या दोन प्रश्नांची उत्तरें अगदी समाधानकारक दिली आहेस. माझा याबाबतीतला संशय दूर झाला. आता मला सांग की ईश्वर काय करतो?”

मुलगा म्हणाला, “ ही तुम्ही गुरु बनून विचारता आहात, की शिष्य बनून?”

बादशहा म्हणाला, “गुरु म्हणून नाही, मी शिष्य म्हणून विचारतो आहे!”

मुलगा म्हणाला, “अजब शिष्य आहात तुम्ही, महाराज! गुरु खाली उभा आहे, आणि तुम्ही उंच आसनावर बसला आहात!”

वरमून बादशहा खाली उतरला आणि मुलाला सिंहासनावर बसवले. हात जोडून म्हणाला, “आता सांग, ईश्वर काय करतो?”

मुलगा हंसून म्हणाला, ‘ हेच करतो, महाराज, वरच्याला खाली करतो आणि खालच्याला वर करतो!”

आणि ही खरेच नाही काय? मोठ्या मोठ्या लोकांना धुळीला मिळतांना आपण पाहत नाही काय? आणि धुळीत असणाऱ्यांनाही सिंहासनावर बसलेले आपण पाहत नाही काय? सगळे सोडून जातात, सगळ्या आशा समाप्त होतात, तेंव्हा तोच एक ईश्वर मनुष्याच्या बरोबर राहतो. त्याचे रक्षण करतो.

वैदिक धर्माचे प्रचारक, सुप्रसिद्ध आर्यसमाजी महात्मा आनंद स्वामी नांवाचे  सत्पुरुष होऊन गेले,(15 ऑक्टोबर 1882 – 24 ऑक्टोबर 1977)ते गायत्री मंत्राचे प्रचारक होते. त्यांनी ‘गायत्री मंत्राचे महत्त्व’ या विषयावर दिलेल्या  प्रवचनांमधून वरील गोष्टी संकलित केलेल्या आहेत.

 

माधव भोपे 

Shri Guru Dattatreya

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Shri Guru Dattatreya

दत्त जन्म की कथा

आज 14 दिसंबर, मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा का दिन, जिसे दत्त जयंती के रूप में मनाया जाता है।
महायोगीश्वर भगवान दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इनका अवतरण मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा को प्रदोष काल में हुआ।
दत्तात्रेय को भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक माना गया है। मार्कंडेय पुराण के 9वें और 10वें अध्याय में भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा बताई गई है।

दत्तात्रेय नाम की कथा
श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि महर्षि अत्रि ने पुत्र प्राप्ति की कामना से व्रत किया। तब भगवान विष्णु ने कहा, “दत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्तः” अर्थात “मैंने अपने आपको तुम्हें दे दिया।” भगवान विष्णु अत्रि के पुत्र के रूप में प्रकट हुए और “दत्त” कहलाए। चूंकि वे अत्रि के पुत्र थे, अत: उन्हें “आत्रेय” भी कहा गया। इस प्रकार, उनका नाम “दत्तात्रेय” प्रसिद्ध हुआ।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मृग नक्षत्र में संध्या के समय दत्तात्रेय का जन्म हुआ, इसलिए इस दिन उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है।

दत्तात्रेय के जन्म की कथा
महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसूया एक साध्वी और पतिव्रता महिला थीं। वह अपने आश्रम में आने वाले अतिथियों का स्नेह और आदर के साथ स्वागत करती थीं। किसी भी अतिथि को वह भूखा या खाली हाथ नहीं जाने देती थीं। उनके पतिव्रत्य और सेवा भाव के प्रभाव से सूर्यदेव भी उनके सामने शीतल हो जाते और पवन भी उनके समक्ष नम्र हो जाता।
उनके पतिव्रत्य की ख्याति सुनकर नारद मुनि ने यह समाचार ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पत्नियों सावित्री, लक्ष्मी और पार्वती को सुनाया। इससे उन देवियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उन्होंने अनुसूया की परीक्षा लेने का विचार किया और अपने पतियों से उसका सत्त्व हरण करने का आग्रह किया।

त्रिदेव ब्राह्मण रूप धारण कर महर्षि अत्रि के आश्रम में आए। अनुसूया ने उनका सत्कार किया और भोजन की विनती की। ब्राह्मण रूप में त्रिदेव ने कहा कि उन्हें विवस्त्र होकर भोजन परोसना होगा। अनुसूया ने अपने तपोबल से उनकी पहचान कर ली। उन्होंने अपने पति का स्मरण कर उनकी शक्ति का जल उन ब्राह्मणों पर छिड़का, जिससे वे तीनों शिशु बन गए। अनुसूया ने उनकी इच्छा पूरी की और उन्हें स्तनपान करवाया।
जब महर्षि अत्रि लौटे, तो उन्होंने पूरी घटना सुनी और नारद मुनि को यह बताया। नारद ने यह बात देवियों को बताई। देवियां चिंतित होकर अनुसूया के पास पहुंचीं और क्षमा याचना की। अनुसूया ने अत्रि मुनि के कहने पर उन बालकों पर गंगाजल छिड़का, जिससे वे देव रूप में लौट आए।
त्रिदेव ने प्रसन्न होकर अनुसूया को वरदान दिया कि वे तीनों एक स्वरूप में उनके पुत्र बनेंगे। इस प्रकार, दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

दत्तात्रेय का स्वरूप और उनका अर्थ
दत्तात्रेय का प्रिय स्थान उंबर का वृक्ष है। उनका स्वरूप जटाधारी, विभूति लगाए, व्याघ्र चर्म पहने, कंधे पर झोली और साथ में गाय व चार कुत्तों के साथ दिखाया जाता है।

  • गाय पृथ्वी का प्रतीक है या कामधेनु का स्वरूप है।
  • चार कुत्ते चार वेदों का प्रतीक हैं।
  • त्रिशूल तीन गुणों पर विजय का प्रतीक है।
  • सुदर्शन चक्र काल का प्रतीक है।
  • शंख “ॐ” ध्वनि का प्रतीक है।
  • भस्म वैराग्य का प्रतीक है।
  • भिक्षापात्र दान का संदेश देता है।
  • जपमाला नामस्मरण का महत्व बताती है।

दत्तात्रेय का महत्व विभिन्न संप्रदायों में

दत्तात्रेय वारकरी संप्रदाय में भी पूजनीय हैं। श्री ज्ञानदेव और श्री एकनाथ दत्त उपासक थे। आनंद संप्रदाय की गुरु परंपरा दत्तात्रेय से ही प्रारंभ होती है। चैतन्य संप्रदाय की गुरु परंपरा राघव-चैतन्य-केशव-बाबाजी-तुकाराम के रूप में है। इस परंपरा के राघव चैतन्य ने दत्त की उपासना की थी। मुस्लिम समाज में इस देवता को “शाह फकीर” के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भक्तों के लिए दत्त प्रभु मलंग वेष  धारण करते हैं। इस कारण दत्त के कई भक्त मुस्लिम समुदाय में भी हैं।

D. Gukesh: The Youngest Chess Champion Making India Proud

D. Gukesh: The Youngest Chess Champion Making India Proud

D. Gukesh: Youngest

Chess World Champion and a Beacon for Indian Chess

D. Gukesh, at just 18 years old, has claimed the 2024 World Chess Championship, marking a historic moment in the global chess arena and for India. His victory over defending champion Ding Liren by 7.5 to 6.5 in a tense 14-game series not only earned him a place among the chess greats but also made him the youngest world champion in history. This feat broke the 39-year record held by Garry Kasparov, who won at 22 in 1985.

A Journey of Genius and Grit

Born on May 29, 2006, in Chennai, Tamil Nadu, Gukesh Dommaraju showed an innate flair for chess at a young age. Encouraged by his parents, Dr. Rajinikanth, an ENT surgeon, and Dr. Padma, a microbiologist, Gukesh began learning chess at seven. His parents were instrumental in nurturing his passion, supporting his aspirations through training sessions and tournaments.

Gukesh’s early achievements set the stage for his remarkable career. Winning the Under-9 Asian School Chess Championship in 2015 was his first significant milestone. He continued to excel, capturing the Under-12 World Youth Chess Championship in 2018. That year, he also dominated the Asian Youth Chess Championships, bagging five gold medals across rapid, blitz, and classical formats.

By 12 years and 7 months, Gukesh had earned the prestigious Grandmaster title in 2019, becoming the third-youngest in history at the time. His rapid ascent was marked by unwavering focus, hours of rigorous practice, and a relentless drive to improve.

Mentors and Influences

Gukesh’s success is also a testament to the guidance he received from his coaches and the inspiration of Indian chess legend Viswanathan Anand. Anand, a five-time world champion, played a significant role as a mentor and role model. Gukesh credits Anand’s strategic acumen and mental discipline for shaping his own approach to the game.

Additionally, Gukesh’s trainers, who worked tirelessly on his openings, middle-game tactics, and endgame strategies, were critical to his development. Regular sparring with top players and participation in elite tournaments provided Gukesh with invaluable exposure to the international chess scene.

The Championship Battle

The 2024 World Championship saw Gukesh face off against China’s Ding Liren, who had claimed the title in 2023. The match was a thrilling encounter, reflecting the highest levels of strategic depth and resilience. Gukesh took early wins in Games 3 and 11, showcasing precision and preparation. Despite Ding’s comeback victories in Games 1 and 12, Gukesh held his ground.

The final and decisive 14th game was a true test of nerves and skill. Gukesh maintained composure under immense pressure, capitalizing on Ding’s small inaccuracies to secure his historic win without tie-breaks.

A Historic Victory for India

Gukesh’s victory has profound implications for Indian chess. For decades, Viswanathan Anand was the sole representative of India at the pinnacle of the chess world. Gukesh’s triumph signals the rise of a new generation of Indian players who are making their mark on the global stage.

The past few years have witnessed an explosion of talent in Indian chess, with players like R. Praggnanandhaa, Nihal Sarin, and Arjun Erigaisi gaining international acclaim. Gukesh’s victory adds to this momentum, cementing India’s status as a chess powerhouse.

The success of these players is also attributed to the growing support for chess in India. Increased sponsorship, better access to training resources, and the rise of online platforms have democratized the sport, enabling more young talents to emerge.

Inspiring Future Generations

Gukesh’s journey from a curious child to the world champion is a source of inspiration for millions. His story underscores the importance of hard work, dedication, and the role of a supportive ecosystem in achieving greatness.

As Gukesh steps into his role as the 18th world champion, he carries the hopes of a nation eager to see more Indian players dominate the international stage. His victory is not just a personal milestone but a significant moment for Indian sports, highlighting the country’s potential to produce world-class talent in disciplines beyond cricket.

Conclusion

D. Gukesh’s triumph at the World Chess Championship is a testament to his brilliance, discipline, and the unwavering support of his mentors and family. As the youngest world champion in history, Gukesh has opened a new chapter in chess, both for himself and for India. His achievement serves as an enduring reminder that with talent, hard work, and the right support, even the loftiest goals are within reach.

This is a proud moment for India and a shining example of what the country’s youth can achieve on the global stage.

आहार शुद्धि – Proper Diet

proper diet

Proper Diet

आहार शुद्धि

मनुष्याचा जो स्वभाव बनतो, त्यात अनेक कारणें असतात. त्यात आहार हेही एक कारण असते. ‘ जैसा खावे अन्न, वैसा बने मन.’ आहार जितका सात्त्विक असेल तितकी वृत्ति सात्त्विक बनते.

सात्त्विक, राजस आणि तामस आहार म्हणजे काय, हे जर समजून घ्यायचे असेल, तर गीतेमध्ये याबद्दल थोडक्यात पण फार सटीक वर्णन केले आहे. गीतेच्या १७ व्या अध्यायात (श्रद्धात्रय विभाग योग) श्लोक ८ ते १० मध्ये भगवंताने सांगितले आहे-

आयु:सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: |
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विकप्रिया: || 8||

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिन: |
आहारा राजसस्येष्टा दु:खशोकामयप्रदा: || 9||

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् |
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् || 10||

सात्त्विक मनुष्यामध्ये विवेक जागृत असतो, त्यामुळे तो आहाराच्या चव किंवा रूप रस गंध यापेक्षा, त्याच्या परिणामाकडे आधी लक्ष देतो. त्यामुळे सात्त्विक आहाराचे वर्णन करतांना भगवंतानेही प्रथम त्याचा परिणाम काय होतो हे वर्णन केले आहे- अर्थात- सात्त्विक आहार हा आयुष्य, सत्त्व, बल, आरोग्य, आणि सुख, संतोष वाढविणारा असतो- आणि नंतर त्याचे वर्णन केले आहे- तो रसपूर्ण, स्निग्ध, स्थिर राहणारा आणि हृदयाला बळ देणारा असतो.

राजस मनुष्यामध्ये भोज्य पदार्थांबद्दल  ‘राग’ (मराठीतील ‘राग-म्हणजे क्रोध- तो नव्हे, तर राग म्हणजे आसक्ति) असतो- म्हणून त्याची दृष्टी सर्वप्रथम भोज्य पदार्थाच्या बाह्य रूप, रस, गंध आणि चव याकडे जाते, उदा.- तिखट तर्रीदार मिसळ, कांद्याचे भजे, खमंग साबुदाणा वडा- इत्यादि यांची चव इत्यादि यांना प्रथम प्राधान्य राहते. अशा वेगवेगळ्या खाद्य पदार्थांचा आनंद घेणे म्हणजेच जीवनाचा आनंद घेणे अशी त्याची दृढ समजूत असते. ‘ये नही खाया तो तूने क्या हासिल किया जिंदगीमें’ अशी वाक्यें आपण सर्रास ऐकतो किंवा वाचतोच. तर भगवंताने राजस आहाराचे वर्णन करतांना आधी त्याची चव, स्पर्श इत्यादींचे वर्णन केले आहे- कटु- (संस्कृत मध्ये कटु म्हणजे तिखट), आम्ल- म्हणजे आंबट, लवण म्हणजे खारट(उदा. वेगवेगळ्या प्रकारची लोणची), अत्युष्ण- म्हणजे अतिशय गरम गरम, तीक्ष्ण- म्हणजे जिभेला झोंबणारे, रुक्ष (उदा. चिवडा, भेळ इत्यादि) आणि विदाहिनः म्हणजे दाह उत्पन्नकरणारे- झणझणीत-अशा प्रकारचा आहार हा राजस व्यक्तिला प्रिय असतो- 

  आणि या आहाराचे वर्णन करून झाल्यावर मग त्याचे परिणाम वर्णन केले आहेत, जशी राजस स्वभावाची व्यक्ति आधी असा जिभेला पाणी आणणारा आहार दिसताच त्यावर तुटून पडते, आणि नंतर त्याचे परिणाम दिसायला लागतात, त्याचे परिणाम म्हणजे- दु:खशोकामयप्रदा: असा आहार खातांना जरी प्रिय लागला, तरी त्याचा परिणाम हा भविष्यात- दुःख, शोक आणि ‘आमय’ म्हणजे रोग यामध्ये होतो.

तामस मनुष्यामध्ये मोह म्हणजे मूढता असते. त्यामुळे तो मोहपूर्वक भोजन करतो. म्हणून तामस आहाराच्या वर्णनात केवळ तामस पदार्थांचे वर्णन आले आहे, परिणामाचे वर्णन आले नाही-

यात-यामम् – याम या संस्कृत शब्दाचा अर्थ तीन तासांचा अवधि असा होतो. यात-यामम् म्हणजे जे अन्न शिजवून तीन तासांच्या वर अवधि उलटून गेलेला आहे. आपण सकाळचे करून ठेवलेले पदार्थ संध्याकाळी खातो, किंवा रात्रीचे पदार्थ सकाळी फोडणी देऊन वगैरे खातो-(अन्न वाया कसे घालवायचे(?) या सदराखाली) ते सर्व या श्रेणीत मोडतात. (याबद्दल नंतर कधी सविस्तर लिहिले जाईल)

गत-रसम् – स्वादरहित, पूति – दुर्गंधयुक्त, पर्युषितम् – म्हणजे शिळे, एक रात्र उलटून गेलेले, खराब झालेले, उच्छिष्टम् – दुसऱ्यांचे उष्टे, अमेध्यम् म्हणजे अशुद्ध, अपवित्र- (आपण हॉटेल मध्ये अत्यंत चवीने खात असलेले अन्न यातील कुठल्या कुठल्या प्रकारात मोडते हे आपले आपण तपासून पहावे)

अशा प्रकारे गीतेमध्ये भगवंतांनी तीन प्रकारच्या आहाराचे वर्णन केले आहे.

याशिवाय भगवंताने अनेक ठिकाणी आहारा संबंधी उल्लेख केला आहे

अध्याय 4-

अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: ||4- 30||

इथे नियत म्हणजे मोजका आहार असे वर्णन केले आहे.

अध्याय 6

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत: |
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || 16||

जे लोक खूप जास्त किंवा खूप कमी खातात, खूप झोपतात किंवा झोपतच नाही अथवा कमी झोपतात त्यांना ‘योग’ साध्य होऊ शकत नाही.[ या श्लोकाचे अनेक प्रकारचे अर्थ लोक लावू शकतात आणि आपल्या वागण्याचे समर्थन करू शकतात- पण तो एक वेगळाच विषय आहे].

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥17॥

 जे लोक योग्य तेवढाच आहार घेतात- ना कमी ना जास्त, योग्य तितकेच झोपतात- थोडक्यात म्हणजे मर्यादेत सगळ्या गोष्टी करतात त्यांना विनासायास योग साध्य होऊ शकतो.

आता वरील विवेचनावरून अजून कितीतरी प्रश्न निर्माण होऊ शकतात- स्वामी रामसुखदासजींनी त्यांच्या गीता दर्पण या पुस्तकात अतिशय समर्पकपणे अशा प्रश्नांची उत्तरें दिली आहेत. खाली  आपण अशा काही शंकांची  चर्चा करणार आहोत.

आहार शुद्धि-2

याआधी आपण मनुष्याचा स्वभाव बनण्यास ‘आहार’ हे एक मुख्य कारण असल्याचे पाहिले, आणि गीतेमध्ये आहाराबद्दल काय सांगितले आहे ते थोडक्यात पाहिले, तसेच सात्त्विक, राजस आणि तामस आहार यांची थोडक्यात माहिती घेतली.

पण सात्त्विक आहार पण प्रमाणाबाहेर घेतल्यास काय होते? गीतेमध्ये सगळ्याच गोष्टींबद्दल मध्यम मार्गाचे समर्थन केले आहे- ना अति कमी, ना अति जास्त. सात्त्विक मनुष्याने सुद्धा सात्त्विक आहार, काही कारणामुळे-जसे की त्याच्या चवीबद्दल त्याच्या मनात तात्पुरता का होईना, पण मोह निर्माण झाला, आणि ते अधिक मात्रेत घेतले, तर तो राजस आहार होईल, ज्याचा परिणाम रोगामध्ये होईल. आणि अधिक लोभात येऊन त्याने तेच सात्त्विक भोजन अत्यधिक प्रमाणात सेवन केले, तर तोच आहार तामस होईल, ज्याचा परिणाम निद्रा आणि आळस यांच्यात होईल.  याउलट राजस मनुष्याने राजस भोजनही कमी प्रमाणात घेतले तर त्याचा परिणाम राजस (रोग, दुःख इ.) न होता सात्त्विक भोजनाप्रमाणे होईल. हीच गोष्ट तामस आहारालाही लागू होईल.

आहाराचे पदार्थ सात्विक असूनही जर ते न्याययुक्त आणि सच्च्या कमाईचे नसतील, निषिद्ध मार्गाने मिळविलेल्या पैशांचे असतील, तर असा आहार, सात्त्विक असूनही काही ना काही राजसी किंवा तामसी वृत्ति निर्माण करेल. त्यामुळे आहार सात्त्विक असावा, सच्च्या कमाईचा असावा, पवित्रतापूर्वक बनवलेला असावा, आणि भगवंताला अर्पण करून, शांतिपूर्वक थोड्या प्रमाणात ग्रहण करावा, जेणेकरून त्याचा अतिशय चांगला परिणाम होईल.

राजस आहार न्याययुक्त आणि सच्च्या कमाईचा असला, तरी, अशा आहाराचा शरीरावर तात्काळ होणारा जो परिणाम आहे, रोग उत्पत्ति इ . तो तर होईलच, पण हा आहार न्याययुक्त आणि सच्च्या कमाईचा असल्याने असा परिणाम जास्त वेळ टिकणार नाही आणि राजस वृत्ति जास्त वेळ राहणार नाही.

तसेच तामस भोजन सच्च्या कमाईचे असले तरी, तामस वृत्ति, जसे की आळस, निद्रा इत्यादि तर होतीलच. पण ते कमी प्रमाणात होईल.

कोणत्याही वर्ण, आश्रम, संप्रदायाचा मनुष्य असला, तरी तो जर परमार्थ मार्गात लागला असेल, साधन करीत असेल, तर त्याची रुचि स्वाभाविक रित्याच सात्विक आहारात राहील, राजस किंवा तामस आहारात राहणार नाही.

प्रश्न: आयुर्वेद आणि धर्मशास्त्रात विरोध का आहे? जसे की आयुर्वेदात अरिष्ट, आसव, मदिरा, मांस इत्यादींची योजना औषध रूपात केलेली आढळते, जेंव्हा की धर्मशास्त्र याचा निषेध करते, असे का?

उत्तर: शास्त्रें चार प्रकारची आहेत- नीतिशास्त्र, आयुर्वेदशास्त्र, धर्मशास्त्र आणि मोक्षशास्त्र.  नीतिशास्त्रामध्ये धन, संपत्ति, वैभव इत्यादि प्राप्त करण्या विषयी माहिती आलेली आहे. नीतिशास्त्रात कूटनीतिचे ही वर्णन येते, ज्यामध्ये दुसऱ्यांशी छल कपट करण्याचे मार्गही सांगितले आहेत, जे की ग्राह्य नाहीत. आयुर्वेदशास्त्रामध्ये शरीराची मुख्यता आहे, त्यामुळे त्यात मुख्यत्वे करून त्याच गोष्टी सांगितल्या जातात, ज्यामुळे शरीर ठीक राहील. या गोष्टी काही वेळेस पडतात. धर्मशास्त्रामध्ये सुखभोगाची मुख्यता आहे, त्यामुळे त्याच्यात मुख्यत्वे करून त्याच गोष्टी सांगितल्या जातात, ज्यामुळे इहलोक आणि परलोक दोनहीमध्ये सुख मिळेल. मोक्षशास्त्रात जिवाच्या कल्याणाची मुख्यता आहे, त्यामुळे,  त्याच्यात मुख्यत्वे करून त्याच गोष्टी सांगितल्या जातात ज्यामुळे जीवाचे कल्याण होईल. धर्मशास्त्राच्या विरुद्ध मोक्षशास्त्रात धर्मशास्त्राच्या विरुद्ध गोष्टी येत नाहीत. त्याच्यात सकाम भावाचे वर्णन येते, पण त्याचे महत्त्व नाही सांगितले, उलट त्याची निंदाच केलेली आहे. कारण की साधकात जोपर्यंत सकाम भाव राहतो, तो पर्यन्त परमात्मप्राप्तिमध्ये उशीर लागतो.

आयुर्वेद आणि धर्मशास्त्र, दोन्ही प्रकृतीच्या राज्यातील आहेत.

लोकांमध्ये साधारण अशी भावना बनलेली दिसते की औषध रूपात मांस इ. अशुद्ध पदार्थ खाण्यात काही दोष नाही. पण असे तेच लोक  असतात, ज्यांच्यात केवळ शरीर ठीक ठेवणे, सुख आराम मिळविणे, हाच मुख्य उद्देश असतो.

प्रश्न: शरीर राहील तर मनुष्य साधन भजन करेल- त्यामुळे अभक्ष्य भक्षण केल्याने शरीर नीट राहत असेल तर त्यात काय हरकत आहे?

उत्तर: अभक्ष्य भक्षण केल्याने शरीर कायम राहील, मृत्यू टळेल असे नाही. आयुष्य बाकी असेल तर शरीर राहील. शरीराचे राहणे किंवा न राहणे ही प्रारब्धाच्या अधीन आहे. अभक्ष्य भक्षणाने मृत्यू टळू शकत नाही, केवळ शरीर थोडे पुष्ट होऊ शकते.

मनुष्य साधन भजन करण्याचा केवळ बहाणा बनवतो, खरे तर शरीरात मोह आसक्ती असल्याने तो अशुद्ध गोष्टींचे सेवन करतो.

वरील विवेचन ही स्वामी रामसुखदासजी यांच्या गीता दर्पण नांवाच्या पुस्तकावर आधारित आहे.

माधव भोपे 

Gita Jayanti and Mokshada Ekadashi गीता जयंती 2024 आणि मोक्षदा एकादशी

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गीता जयंती 

आज दि. 11 डिसेंबर, मार्गशीर्ष महिन्याची शुक्ल एकादशी हा दिवस गीता जयंती म्हणून साजरा केला जातो. याच दिवशी द्वापारयुगात भगवान श्रीकृष्णाने अर्जुनाला गीता सांगितली होती अशी मान्यता आहे.

श्रीमद्भगवद्गीतेचे माहात्म्य आपल्याला नवीन सांगायला नको.

श्रीमद्भगवद्गीतेचे माहात्म्य अगाध आणि असीम आहे. हा भगवद्गीता ग्रंथ प्रस्थानत्रयींमध्ये मानला जातो. मानवजातीच्या उद्धाराचे तीन राजमार्ग प्रस्थानत्रय या नांवाने सांगितले जातात.

त्यापैकी ‘उपनिषद्’ हा वैदिक मार्ग आहे. दुसरा ब्रह्मसूत्र हा दार्शनिक मार्ग आहे, आणि भगवद्गीता हा स्मार्त मार्ग आहे (म्हणजे श्रुति आणि स्मृति यांना अनुसरणारा),असे म्हटले जाते.

उपनिषदांमध्ये ‘मंत्र’ आहेत, ब्रह्मसूत्रामध्ये ‘सूत्रें’ आहेत आणि गीतेमध्ये ‘श्लोक’ आहेत. श्रीमद्भगवद्गीतेमध्ये श्लोक असूनही प्रत्यक्ष भगवंतांची ‘वाणी’ असल्यामुळे, ते मंत्रच आहेत.  ह्या श्लोकांमध्ये अत्यंत गहन अर्थ भरलेला असल्यामुळे त्यांना ‘सूत्रें’ ही म्हटले जाते. उपनिषद् ‘अधिकारी’ मनुष्यांच्या उपयोगाचे आहे, ब्रह्मसूत्र ‘विद्वानांच्या’ उपयोगाचे आहे, परंतु भगवद्गीतेतील ज्ञान हे सर्वांच्या उपयोगाचे आहे.

भगवद्गीता हा एक अत्यंत अलौकिक आणि वैचित्र्यपूर्ण ग्रंथ आहे. साधक कोणत्याही देशाचा, भाषेचा, धर्माचा, विचाराचा, संप्रदायाचा, वर्णाचा, आश्रमाचा असला तरीही त्याच्या उपयोगी पडणारी संपूर्ण साधन सामग्री या ग्रंथात आहे.

कारण की, गीतेमध्ये कोणत्याही संप्रदायाची निंदा अथवा स्तुति केलेली नाही, तर वास्तविक तत्त्वाचेच वर्णन केलेले आहे. वास्तविक तत्त्व तेच आहे, की जे परिवर्तनशील, प्रकृति आणि प्रकृतिजन्य पदार्थांपासून सर्वथैव अतीत, आणि संपूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, इत्यादींमध्ये नित्य, निरंतर एकरस आणि एकरूप राहणारे आहे. जो मनुष्य ज्या ठिकाणी आणि जसा आहे, त्या ठिकाणी आणि तसेच, वास्तविक तत्त्व पूर्ण विज्ञमान आहे. परंतु परिवर्तनशील असलेल्या वस्तु, व्यक्ति मध्ये ‘राग’ आणि द्वेषामुळे त्याचा अनुभव येत नाही. संपूर्णपणे रागद्वेषरहित झाल्यानंतर त्याचा स्वाभाविकच अनुभव येतो.

 

गीतेमध्ये साधनांचे वर्णन करण्याबाबत, विस्तारपूर्वक समजावण्याबाबत एकेका साधनाचे अनेक वेळा कथन करण्यात संकोच केलेला नाही. आपल्या कल्याणाची उत्कट अभिलाषा असणारा मनुष्य कोणत्याही परिस्थितीत परमात्व तत्त्वाला प्राप्त करून घेऊ शकतो. युद्धासारख्या भयंकर परिस्थितीमध्येही आपले कल्याण करून घेऊ शकतो. अशा प्रकारे व्यवहारामध्ये राहूनही परमात्त्व प्राप्तीची कला गीतेमध्ये शिकविली आहे. त्यामुळे गीतेची बरोबरी करू शकेल असा दुसरा कोणताही ग्रंथ दिसत नाही.

 

स्वामी रामसुखदासजी सांगतात- गीता हा एक प्रासादिक ग्रंथ आहे. याचा आश्रय घेऊन पाठ केले असता अत्यंत विलक्षण, अलौकिक आणि शांती प्रदान करणारे भाव स्फुरण पावतात. याचे मनःपूर्वक पठण केल्यास परम शांती मिळते. ह्याचा एक विधी असा आहे की, प्रथम गीतेचे संपूर्ण श्लोक अर्थासहित पाठ करावेत, नंतर एकांतात बसून गीतेच्या “यत्र योगेश्वर कृष्ण” या शेवटच्या श्लोकापासून “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे” या पहिल्या श्लोकापर्यंत पुस्तकावाचून उलटा पाठ केल्यास परम शांती मिळते. गीतेचा दररोज एक वेळा किंवा अनेक वेळा पूर्ण पाठ केल्यास गीतेचे विशेष अर्थ स्फुरतात. मनामध्ये कोणत्याही प्रकारची शंका असल्यास पाठ करता करताच तिचे निरसन होते. वास्तविक या ग्रंथाचे माहात्म्य वर्णन करण्यास कोणीही समर्थ नाही.

 

आज गीताजयंतीच्या दिवशी, भगवान श्रीकृष्णाचे स्मरण करून, गीतेतील जितके जमतील तितके अध्याय वाचल्यास नक्कीच हा दिवस सार्थकी लावल्यासारखे होईल.

मोक्षदा एकादशी

आजच्या या एकादशीला मोक्षदा एकादशीही म्हणतात. प्राचीन काळी वैखानस नांवाचा राजा गोकुळावर राज्य करीत होता. त्याला एकदा स्वप्नामध्ये त्याचे वडील मृत्यूनंतर अतिशय कष्ट भोगत असल्याचे दिसले. त्यावरून त्याने राजपुरोहिताचा सल्ला घेतला, राजपुरोहिताने त्याला पर्वत नांवाच्या ऋषींकडे पाठविले. त्यांनी त्यांच्या ज्ञानाने जाणून राजाला सांगितले की त्याचे वडील त्यांच्या काही पापाचरणाने नरकात कष्ट भोगत आहेत. त्यावर उपाय म्हणून मार्गशीर्ष महिन्यातील शुक्ल पक्षातील एकादशीचे, जिचे नांव मोक्षदा एकादशी आहे, तिचे व्रत करून तिचे पुण्य आपल्या वडिलांना द्यावे, जेणेकरून ते त्यांच्या पापातून मुक्त होतील. राजाने ऋषींनी सांगितल्याप्रमाणे मोक्षदा एकादशीचे व्रत करून त्याचे पुण्य आपल्या वडिलांना दिल्यावर ते मुक्त झाले अशी कथा आहे. मोक्षदा एकादशीला आपल्या पितरांसाठी तर्पण करावे असे सांगितले आहे.

 

श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!