Shri Guru Dattatreya
दत्त जन्म की कथा
आज 14 दिसंबर, मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा का दिन, जिसे दत्त जयंती के रूप में मनाया जाता है।
महायोगीश्वर भगवान दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इनका अवतरण मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा को प्रदोष काल में हुआ।
दत्तात्रेय को भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक माना गया है। मार्कंडेय पुराण के 9वें और 10वें अध्याय में भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा बताई गई है।
दत्तात्रेय नाम की कथा
श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि महर्षि अत्रि ने पुत्र प्राप्ति की कामना से व्रत किया। तब भगवान विष्णु ने कहा, “दत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्तः” अर्थात “मैंने अपने आपको तुम्हें दे दिया।” भगवान विष्णु अत्रि के पुत्र के रूप में प्रकट हुए और “दत्त” कहलाए। चूंकि वे अत्रि के पुत्र थे, अत: उन्हें “आत्रेय” भी कहा गया। इस प्रकार, उनका नाम “दत्तात्रेय” प्रसिद्ध हुआ।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मृग नक्षत्र में संध्या के समय दत्तात्रेय का जन्म हुआ, इसलिए इस दिन उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है।
दत्तात्रेय के जन्म की कथा
महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसूया एक साध्वी और पतिव्रता महिला थीं। वह अपने आश्रम में आने वाले अतिथियों का स्नेह और आदर के साथ स्वागत करती थीं। किसी भी अतिथि को वह भूखा या खाली हाथ नहीं जाने देती थीं। उनके पतिव्रत्य और सेवा भाव के प्रभाव से सूर्यदेव भी उनके सामने शीतल हो जाते और पवन भी उनके समक्ष नम्र हो जाता।
उनके पतिव्रत्य की ख्याति सुनकर नारद मुनि ने यह समाचार ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पत्नियों सावित्री, लक्ष्मी और पार्वती को सुनाया। इससे उन देवियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उन्होंने अनुसूया की परीक्षा लेने का विचार किया और अपने पतियों से उसका सत्त्व हरण करने का आग्रह किया।
त्रिदेव ब्राह्मण रूप धारण कर महर्षि अत्रि के आश्रम में आए। अनुसूया ने उनका सत्कार किया और भोजन की विनती की। ब्राह्मण रूप में त्रिदेव ने कहा कि उन्हें विवस्त्र होकर भोजन परोसना होगा। अनुसूया ने अपने तपोबल से उनकी पहचान कर ली। उन्होंने अपने पति का स्मरण कर उनकी शक्ति का जल उन ब्राह्मणों पर छिड़का, जिससे वे तीनों शिशु बन गए। अनुसूया ने उनकी इच्छा पूरी की और उन्हें स्तनपान करवाया।
जब महर्षि अत्रि लौटे, तो उन्होंने पूरी घटना सुनी और नारद मुनि को यह बताया। नारद ने यह बात देवियों को बताई। देवियां चिंतित होकर अनुसूया के पास पहुंचीं और क्षमा याचना की। अनुसूया ने अत्रि मुनि के कहने पर उन बालकों पर गंगाजल छिड़का, जिससे वे देव रूप में लौट आए।
त्रिदेव ने प्रसन्न होकर अनुसूया को वरदान दिया कि वे तीनों एक स्वरूप में उनके पुत्र बनेंगे। इस प्रकार, दत्तात्रेय का जन्म हुआ।
दत्तात्रेय का स्वरूप और उनका अर्थ
दत्तात्रेय का प्रिय स्थान उंबर का वृक्ष है। उनका स्वरूप जटाधारी, विभूति लगाए, व्याघ्र चर्म पहने, कंधे पर झोली और साथ में गाय व चार कुत्तों के साथ दिखाया जाता है।
- गाय पृथ्वी का प्रतीक है या कामधेनु का स्वरूप है।
- चार कुत्ते चार वेदों का प्रतीक हैं।
- त्रिशूल तीन गुणों पर विजय का प्रतीक है।
- सुदर्शन चक्र काल का प्रतीक है।
- शंख “ॐ” ध्वनि का प्रतीक है।
- भस्म वैराग्य का प्रतीक है।
- भिक्षापात्र दान का संदेश देता है।
- जपमाला नामस्मरण का महत्व बताती है।
दत्तात्रेय का महत्व विभिन्न संप्रदायों में
दत्तात्रेय वारकरी संप्रदाय में भी पूजनीय हैं। श्री ज्ञानदेव और श्री एकनाथ दत्त उपासक थे। आनंद संप्रदाय की गुरु परंपरा दत्तात्रेय से ही प्रारंभ होती है। चैतन्य संप्रदाय की गुरु परंपरा राघव-चैतन्य-केशव-बाबाजी-तुकाराम के रूप में है। इस परंपरा के राघव चैतन्य ने दत्त की उपासना की थी। मुस्लिम समाज में इस देवता को “शाह फकीर” के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भक्तों के लिए दत्त प्रभु मलंग वेष धारण करते हैं। इस कारण दत्त के कई भक्त मुस्लिम समुदाय में भी हैं।
